9 January 2009

तूं मुझे खुजा मै तुझे खुजाऊं

आज पीठ में बहुत खुजली हो रही है और वह भी ऐसी जगह जहाँ तक येढे, मेढे, टेढे, कैसे भी होकर हाथ पहुच ही नही रहा. वैसे खुजली तो कहीं पर भी हो सकती है मसलन सर, आँख, नाक, कान, गला, सीना, पेट, कमर .......आदि. मगर हाथों में खुजली होने पर विशेष आनंद आता है. एक तो खुजलाते वक्त खुजलाहट' का आनंद और दूजा कुछ ''ऊपरी नगद नारायण'' की प्राप्ति होने की आशा का आनंद.
एक दिन एक दरोगा जी को हवालदार से कहते सुना : अरे मिश्रा जी, आज हाथ में बड़ी खुजली हो रही है, काफी दिन से हाथ साफ नही किया, किसी को पकड़ते जरा. मिश्रा जी बोले : अरे साहेब ! अभिये लीजिये, आने दीजिये किसी ठेला-रिक्शा वाले को. मैंने सोचा कि लगता है दरोगा जी कई दिन से नहाये नही हैं और रिक्शा वाले से रगड़वा-रगड़वा कर ' काई छुड़वाएंगे. फ़िर आगे कुछ सोचा ही नही। पुलिस वाले का क्या ? नहाये या नहाये या बदबू मारे, उनसे सटने ही कौन जाता है. और फ़िर रात दिन चोर उचक्कों का साथ, हाथ में 'काई' तो जमती ही है।
खैर थोडी देर में एक कबाडी वाला हांक लगाता हुआ गुजरा. हवालदार ने बेंत लपलपा कर रोका उसे.
अबे रुक ! क्या है बे ? चोरी का माल बेंचता है स्साले?
नही साब ! खाली रद्दी का अख़बार है, अउरो कुछ नही है.
स्साले ! चोट्टे ! चल निकाल बीस रूपये.
अरे साब, बीस रूपये कहाँ से दूँ ? जितना था सब का रद्दी खरीद लिया, यही तीन रुपया बचा है.
हरामी साले जबान लडाता है ? और तीन रूपये अपने जेब के हवाले कर हवालदार उसे दरोगा जी के पास ले गया.
साहेब ! बिना 'परमिट' के कबाडी का काम कर रहा है साला अपने हलके में.
अच्छा ? क्यों बे ! पर्ची कटवाई चौकी पे ?
नाही माई बाप, पर्ची का है ? हम नए-नए काम शुरू किए हैं, हमें कुछ मालूम नाही है साब !
मिश्रा ! जरा बेतवा दीजियेगा ! ससुरे को पर्ची बतावें क्या होता है.
और उसके बाद ! सटाक - सटाक, चट-चट, धम-धम - - - - - . चल रख सारी रद्दी यहीं ! भाग यहाँ से !
कबाडी के जाने के बाद दरोगा जी ने कृतग्य भावः से मिश्रा जी को देखा. मिश्रा ! बहुत दिन बाद ससुरा हाथ साफ करने को मिला . लेकिन साले का चमड़ी नरम नही था, सोटे का निशान तो पड़बे नही किया. अरे हाँ ! रद्दिया लेते जाव. आज के तरकारी के जुगाड़ हुआ .
मिश्रा जी रद्दी समेटते हुए बोले, कौन पछताने की बात है साहेब, नरम चमड़ी वाले को पकड़ लाते हैं, एक बार फ़िर हाथ साफ़ कर लीजिये.
और इससे पहले मिश्रा जी के खोजी नयन मेरी ओर पड़ें, मै वहां से भागा.
भाइयों ! मै इस खुजली पुराण के बीच में थाने से 'लाइव टेलीकास्ट' के लिए क्षमा चाहता हूँ. लेकिन उस दिन 'हाथ की खुजली' छुडाने का एक नया मतलब भी पता ! लगा
खैर मै जगह - जगह होने वाली खुजली के बारे में बता रहा था। कभी कभी तोसरेआम ऐसी जगह खुजली उठती है कि आदमी अश्लील हरकतें करता हुआ प्रतीत होता है. औरतें 'बेशर्म' होने की गाली देने लगती हैं, अफसर कमरे से बाहर तक भगा देते हैं, बीबी शक की नज़र से देखने लग जाती है. एक बार मेरे एक सहकर्मी ऐसी ही खुजली से परेशान थे, इसलिए जब वे अपने अफसर के चैंबर में जाते थे तो अपने दोनों हाथ पीछे करके अँगुलियों को आपस में जकड लेते थे. अफसर बहुत कड़क था इसलिए उन्होंने कभी रिस्क नही लिया. हाँ ! चैंबर से बाहर निकल कर पहले वे दस मिनट अपनी खाज मिटा लेते थे तभीआगे बढ़ते थे.
एक 'कोढ़ में खाज' होती है . अगर किसी के प्रोमोसन के अगले ही दिन एक करोड़ की लाटरी लग जाय तो उसके पड़ोसी की मनोदशा 'कोढ़ में खाज' जैसी ही होती है. सुनते हैं कोई - कोई 'खाज' कोढ़ में भी बदल जाता है. भाड़ में जाए वो.
कई "खुजैले" कुत्ते भी होते हैं, हमेशा अपनी ही पूछ की जड़ नोचने के चक्कर में चरखी की तरह नाचते हुए।लेकिन खुजली के सम्राट का खिताब तो 'अपुन के पूर्वज' बन्दर को ही मिला हुआ है. मुझे कई बार शक होता है कि खुजली का सम्बन्ध कहीं "अल्लाउद्दीन खिलजी" के साथ तो नही. फिलहाल इतिहासकार ही पता लगायें तो बेहतर होगा.
अब मै अपनी खुजली पर वापस लौटता हूँ. पीठ की खुजली कमबख्त बहुत बुरी चीज है . कितना भी स्वाभिमानी आदमी हो उसे बेशर्म बना देती है. उसे या तो येढा , मेढा , टेढा होना पड़ता है या दूसरे से मदद लेनी पड़ जाती है . वैसे खुजली के मामले में पत्नी या प्रेमिका की मदद कभी नही लेना चाहिए, कई बार यह बेहद "आपत्तिजनक" और "गंभीर" अंजाम तक पहुँच जाता है.
बहर हाल कोई मददगार अगर मिल जाता तो उससे मै अपनी पीठ खुजलवा लेता. अगर कोई पीठ की ही खुजली वाला बन्दा मिल जाए तो क्या कहने. वो मेरी पीठ खुजाता और मै उसकी पीठ. किसी पे कोई एहसान नही. सारा उधार तुंरत वापस. भाई कोई है, जो मेरी पीठ खुजा देगा ?
विनोद श्रीवास्तव


4 comments:

अ... विवेक !! said...

सबसे पहले आपके ब्लोग्स बहुत ही अच्छे हैं.. उनके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद !!

आपके ब्लोग्स न सिर्फ़ दौड़ती भागती जिन्दगी में, अतीत याद दिलाते हैं बल्कि दिल को भी छूते हैं. आपके विचार, कवितायें और संस्मरण, मै मौन पूर्वक पढ़ता रहा, लेकिन आपका "तूं मुझे खुजा मै तुझे खुजाऊं" ये अद्भुत है!!

जल्दी ही मै भी कुछ लिखने की कोशिश करूँगा, इसलिए... :)

Smart Indian said...

अच्छा व्यंग्य खुजलाया है, बधाई!

Dr. Ravi Srivastava said...

विनोद जी, नमस्कार!
आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आप की रचनाएँ, स्टाइल अन्य सबसे थोड़ा हट के है....आप का ब्लॉग पढ़कर ऐसा मुझे लगा. आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे. बधाई स्वीकारें।

आप के अमूल्य सुझावों और टिप्पणियों के लिए आप को सहृदय धन्यवाद. आप मेरे ब्लॉग पर आए, शुक्रिया.

आगे भी आप के कमेन्ट का इंतज़ार रहेगा...आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...

Link : www.meripatrika.co.cc

…Ravi Srivastava

Anonymous said...

Vinod Ji your comment is to good keep it, i like ur comment,

Thank You
Navneet Shukla
navneetshukla.blogspot.com